छबडा:- छबड़ा से आठ किलोमीटर दूर पार्वती नदी के तट पर पहाड़ी पर स्थित हजारो वर्ष पुराना गुगोर दुर्ग संरक्षण के अभाव में खंडहर के रूप में परिवर्तित हो चुका हैं। यह दुर्ग खुद अपना इतिहास बयां करता हैं। इस दुर्ग पर खींची राजाओं का राज हुआ करता था। प्राचीन किला ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसकी दीवारों का कुछ हिस्सा बारिश व मिट्टी के कटाव के कारण ढ़हने की कगार पर हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पालिका क्षेत्र से लगभग आठ किलोमीटर दूर पार्वती नदी के तट गांव गुगोर में स्थित हजारो वर्ष पुराना दुर्ग देखरेख एवं संरक्षण के अभाव में खंड़हर के रूप में परिवर्तित हो चुका हैं। ऊंची पहाड़ी पर बना किला इतिहास का साक्षी हैं। साथ ही किले के समीप में स्थित प्राचीन एवं कलात्मक छतरियां, शतरंज का चबूतरा, रानी महल, बाबा की दरगाह इत्यादि इमारते देखरेख व सार-संभाल के अभाव में खंडहर में बदल चुकी है। वहीं दुर्ग के नीचे पार्वती नदी के किनारे महलो के पास गहरे पानी को रानीदेह के नाम से जाना जाता हैं। जानकारो की माने तो मुगलो के द्वारा किले पर आक्रमण करने के बाद खींची राजाओं की रानियों ने जल में कूदकर जल जौहर किया था इसलिए इस स्थान को रानीदेह के नाम से जाना जाता हैं। दुर्ग के अंदर तथा बाहर राजा-महाराजाओं के अनेको शिलालेख लगे हुए हैं। इस दुर्ग में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां, मंदिर व मस्जिद एक ही स्थान पर बनी हुई हैं जो कि खंडित हो चुकी हैं। इस किले में से कई मूर्तियां एवं पुरातत्व की सामग्री भी चोरी हो चुकी हैं!

जानकारो ने यह भी बताया कि दुर्ग अंदर से तीन भागों से बंटा हुआ हैं। दुर्ग में एक गुप्त रास्ता हैं जो कि जमीन के अंदर होकर पार्वती नदी तक जाता हैं। जहां अभी भी घाट तथा दरवाजा बना हुआ है। दुर्ग के पीछे की ओर पार्वती नदी के तट पर आमेठियों में खींची राजा का चबूतरा बना हुआ हैं। जिसे शतरंज के चबूतरे के नाम से जाना जाता हैं। इसी के समीप में कई राजा-रानियों की कलात्मक छतरियां भी बनी हुई है। जिन्हें भूल-भूलैया के नाम से पहचाना जाता हैं। वह भी जर्जर अवस्था में परिवर्तित होती जा रही हैं। छतरियां के समीप में सैंकड़ो वर्ष पुरानी पीर बाबा की दरगाह अभी भी बनी हुई हैं। इस दरगाह पर प्रत्येक जुमेरात को भीड़ देखने को मिलती हैं। तथा इसी दरगाह के समीप में शतंरज चबूतरा वर्तमान में भी सलामत हैं। इस शतरंज के चबूतरे पर खींची राजा धीरसिंह की अदालत लगा करती थी वहां बैठकर राजा प्रजा के दुःख, दर्द सुनकर उनकी समस्या का समाधान कर व न्याय दिलाकर राहत प्रदान करते थे। यह दोनों मंदिर व मस्जिद हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक माने जाते हैं। इन दोनो मंदिर व मस्जिद पर अभी-भी राजस्थान सहित मध्यप्रदेश के श्रृद्धालु अपनी मनोकामना पूरा होने के आस लेकर आते हैं और मन्नते पूरा होने पर रसोईयां करते हैं।

राज्य सरकार व पुरातत्व विभाग का नही हैं ध्यान :- क्षेत्र के गांव गुगोर में हजारो वर्ष पुराना दुर्ग वर्तमान में राज्य सरकार एवं पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण पूर्ण रूप से खंडहर हो गया हैं। किले परिसर में पेड़-पौधे व विभिन्न प्रजातियों के काफी वृक्ष उगने के कारण यह किला एक जंगल के रूप में परिवर्तित होता जा रहा हैं एवं साथ ही किले में विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु भी अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके हैं। अभी वहां यह स्थिति बनी हुई हैं कि इस किले मे अंदर प्रवेश के लिए जनता अपने आप को असुरक्षित व भयभीत महसूस कर रही हैं। इसकी मुख्य दरवाजा एवं दीवारे ढ़हने की कगार पर चल रही हैं। अगर राज्य सरकार व पुरातत्व विभाग समय-समय पर इसकी सार-संभाल कर क्षतिग्रस्त दीवारों एवं ऐतिहासिक ईमारतो की मरम्मत करवा कर रंगाई-पुताई करवा देते हैं तो यह राजस्थान के प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक किलो में अपनी पहचान बना सकता हैं। तथा यह आने वाले समय में एक पर्यटक स्थल भी बन सकता हैं।

मनमोह लेता हैं भड़का प्रपात :- कस्बे के रणणीक स्थलो में गांव गुगोर में स्थित भड़का प्रपात का मुख्य स्थान हैं। तथा इस प्रपात पर वर्षा के दिनों में गिरता झरना पर्यटको का मनमोह लेता हैं जो कि सैलानियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता हैं। छोटे व बड़े भड़का प्रपात पर सैंकड़ो की संख्या में पर्यटक पहुंचकर ’कल-कल’ कर प्रवाहित हो रहे झरने का लुत्फ उठाते हैं। एवं इन प्रपातों पर राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश के पर्यटक पहुंचते हैं तथा पिकनियां मनाते हैं।