आपणी ख़बरा

नेशनल मेडिकल एमएससी टीचर्स एसोसिएशन ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के उस प्रस्ताव का जबरदस्त विरोध किया है, जिसमें एमएससी मेडिकल एवं पीएचडी करने वाले प्रतिभागियों को मेडिकल कॉलेजों में बतौर शिक्षक नियुक्ति नहीं देने पर विचार किया जा रहा है। एसोसिएशन ने पुरजोर ढंग से इस फैसले पर नाराजगी जाहिर की है।
एमएससी टीचर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि पांच दशक पहले मेडिकल कॉलेजों में पूर्व और पैरा मेडिकल विषयों को पढ़ाने के लिए कोई शिक्षण संकाय उपलब्ध नहीं था। इसलिए यूजीसी ने एनाटॉमी, फिजीयोलॉजी, बायोकैमिस्ट्री, माइक्रोबायोलॉजी और फार्माकोलॉजी जैसे विषयों में एमएससी मेडिकल कोर्स के लिए मास्टर डिग्री को मंजूरी दी। तभी से मेडिकल एमएससी स्नातकोत्तर मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों को पढ़ा रहे हैं।
ये चिकित्सा एमएससी डिग्री सामान्य एमससी नहीं है। इसका मतलब है कि उन्हें मेडिकल कॉलेजों में एमडी छात्रों के साथ प्रशिक्षित किया गया है। ऐसे में इन शिक्षकों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। एमसीआई ने शिक्षक पात्रता मानदंडों को लेकर कई संशोधन किए, लेकिन एमससी पाठ्यक्रमों को अयोग्य घोषित नहीं किया है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों का यह भी कहना है कि जिस तरह इंजीनियरिंग के छात्रों को भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित जैसे विषय विज्ञान पृष्ठ भूमि से एमएससी पीएचडी डिग्री धारक पढ़ाते हैं उसी तरह एमसीआई के गु्रप डी के तहत आने वाले मूल विज्ञान विषयों को मूल विज्ञान के पेशेवरों द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए, जिनके पास किसी भी मेडिकल स्नातकोत्तर की बजाय इन विषयों का गहन ज्ञान है।
वैश्विक स्तर पर भी मेडिकल कॉलेजों में अधिकतम संकाय गैर मेडिकल पीएचडी शिक्षकों के हैं। वे सक्रिय रूप से अनुसंधान भी कर रहे हैं। फिर यहां ये भेद नहीं होना चाहिए। यदि भेदभाव होता है तो इसके लिए मेडिकल काउंसिल दोषी है। एसोसिएशन का यह भी कहना है कि एमसीआई इन पाठ्यक्रमों को नियंत्रित नहीं करता है तो इन पाठयक्रमों को अपनी वेबसाइट पर क्यों सूचीबद्ध किया गया है? एसोसिएशन का यह भी आरोप है कि एमसीआई ने एमएससी मेडिकल टीचर्स के मुद्दे पर एम्स की जो समिति बनाई है उसमें भी पक्षपात किया गया। समिति में सभी तीन सदस्य एमडी और वरिष्ठ प्रोफेसर है। एमएससी पीएचडी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। जबकि एम्स में वरिष्ठ पद पर एमएससी पीएचडी संकाय है। एमएससी मेडिकल अगर अहर्ताएं नहीं रखते हैं तो सरकार को इनके लिए परीक्षाएं आयोजित कर भ्रम में नहीं रखना चाहिए। वही जानकारों का कहना है कि यदि इस तरह का बिल पास होता है तो मेडिकल कॉलेज में टीचर कि भारी कमी आ सकती है गौरतलब है कि मेडिकल शिक्षा में पहले ही अधिकतर पद रिक्त चल रहे है उपर से इस तरह का ड्राफ्ट कोढ़ में खाज का काम करेगा।

इनका कहना है सरकार को पक्षपात किए बिना अनैतिक लॉबिंग को अनदेखा करते हुए मेडिकल शिक्षा में दोनों वर्गों को अवसर देने का निर्णय लेना चाहिए। अच्छी शिक्षा के लिए उत्तम योग्यता के आधार पर चयन हो, न कि सिर्फ डिग्री के नाम पर। वह भी सिर्फ इसलिए कि गैर क्लीनिकल डॉक्टर उपलब्ध है। दोनों डिग्रियों के बीच स्पर्द्धा के बजाय साथ मिलकर काम करेंगे तो सबके हित में रहेगा।
डॉ. श्रीधर राव, अध्यक्ष, नेशनल एमएससी मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, दिल्ली