रावतभाटा – शिव सिंह चौहान (पत्रकार) राज्य सरकार द्वारा स्कूलों में 2 जुलाई से बच्चों को दूध देने का विचार है। व्यापक स्तर पर इसकी तैयारी भी शुरू कर दी गई है। हालांकि प्रवेशोत्सव का दूसरा चरण 19 जून से शुरू हो गया है। शिक्षक प्रवेशोत्सव को लेकर गांवों में घूमते हुए नामांकन बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। लेकिन कमरों में बैठक पॉलिसी बना रहे सरकारी नुमाइंदे अभी तक दूध को लेकर होने वाली परेशानी से वाकिफ नही है।
विद्यालयों में दूध वितरण से पैदा होने वाली संभावित मुश्किलों पर मंथन किया गया तो सबसे बड़ी परेशानी ऐसे स्कूलों में आएगी, जहां केवल एक या दो शिक्षक कार्यरत है। इनमें लगभग सभी स्कूल प्राथमिक स्तर है। दरअसल क्षेत्र में अभी लगभग 70 ऐसे विद्यालय है जहां केवल एक ही शिक्षक कार्यरत है। ऐसे में यदि इन स्कूलों में बच्चों को दूध परोसा जाता है तो बड़ा सवाल यह है कि स्कूलों का ताला कब खुलेगा और कौन खोलेगा। पढ़ाई की बात तो दूर इस शिक्षक का पूरा दिन पहले दूध के इंतजाम और बाद में रोटी सब्जी के पोषाहार की व्यवस्था में ही निकल जाएगा। दूसरी बड़ी समस्या एेसे स्कूलों में होगी, जंहा दो शिक्षक कार्यरत है |

कैसे तय करेंगे कि दूध शुद्ध है

मिलावटी दूध की जांच कैसे होगी, इसकी जांच का कोई मैकेनिज्म नही है। यदि पशु बीमार है। और उसका दूध बच्चों को दिया गया तो इसकी जांच का कोई तरीका नही है। ढाई घंटे बाद दूध में पोष्टिक तत्वों की मात्रा प्रभावित होने लगती है, यह कौन सुनिश्चित करेगा कि दूध ताजा है। सरस डेयरी में प्लांट के अंदर 80 लाख रुपए लागत की मशीनों से दूध की शुद्धता की जांच होती है और उसे प्रोसेस किया जाता है, ग्रामीण स्तर पर यह कैसे होगा। स्कूलों में लेक्टोमीटर खरीदने की बात कही जा रही है लेकिन अभी तक बजट आवंटित नही हुआ है। वैसे भी यह सिर्फ पैसों की बर्बादी होगी, क्योंकि इसके जरिए सिर्फ दूध में मिलावट की जांच हो पाएगी, अन्य तत्वों की नही।

कैसे होगी गुणवत्ता की जांच, खुद के सैंपल ही होते है फेल

दरअसल दूध सहकारी समितियों के यहां से खरीदा जाएगा। और ये समिति जांच करने के बाद दूध देगी। सवाल यह है कि इन समितियों के आए दिन सैंपल सरस डेयरी में फेल हो रहे हैं। ऐसे में समितियां सैंपल कैसे पास करेंगी और उसकी प्रामाणिकता क्या होगी, बच्चों को 3.1 फैट का दूध दिया जाएगा।

मिड डे मील के तहत संचालित होने वाली अन्नपूर्णा दूध पोषाहार योजना के तहत ब्लाॅक के सरकारी स्कूलों में नामांकन की संख्या लगभग 19 हजार 514 के है। ब्लॉक में मिड डे मील से लाभान्वित स्कूलों की संख्या 176 है। जिनमें 111 प्राथमिक, 44 उच्च प्राथमिक एवं 30 उच्च माध्यमिक विद्यालय है। इन स्कूलों में उन सभी बच्चों को जो कक्षा 1 से 8 तक में पढ़ रहे है। उन्हें प्रार्थना सभा के बाद दूध दिया जाएगा। प्राथमिक स्तर पर प्रत्येक बच्चे को 150 मिलीलीटर व उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चे को 200 मिलीलीटर प्रतिदिन दूध दिया जाएगा। यह दूध सप्ताह में 3 दिन दिया जाएगा।

जानिए दूध का दर्द

अन्नपूर्णा दूध पोषाहार योजना के तहत कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ेगा। जिसमें शिक्षक के लिए बड़ी चुनौती यह है कि दूध स्कूल तक कैसे लाएंगे। यदि छात्र संख्या 100 है तो 20 किलो दूध कैसे आएगा और इसके बाद कैसे गर्म होगा। योजना में किसी तरह की बाधा हुई तो पीईईओ व प्रभारी जिम्मेदारी होंगे। बच्चों के सामने चुनौती होगी दूध की गुणवत्ता कैसी है, क्या उन्हें पसंद आएगा, दूध में चीनी नही है, ऐसे में क्या फीका दूध ही पीना पड़ेगा। समितियों के समक्ष भी चुनौती रहेगी कि स्कूल में दूध गर्म करते समय यदि फट गया तो समिति को उस दिन के दूध का भुगतान नहीं किया जाएगा। ऐसे में समिति की मुश्किल ऐसे बढ़ जाएगी कि यह कैसे तय होगा कि दूध में खराबी थी। यदि बर्तन में गंदगी की वजह से दूध फटा तो कौन जिम्मेदार होगा। तथा अधिकारी के सामने चुनौती होगी कि यदि दूध की क्वालिटी घटिया हुई तो कौन जिम्मेदार होगा, दूध पीने के बाद बच्चों के साथ होने वाली किसी विपरीत परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेदार होगा। जबकि सरकार का दबाव व्यवस्था को लागू करना है। विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार एकल शिक्षक वाले स्कूलों में दूध लाना तो संबंधित कार्मिक की ही जिम्मेदारी है। हालांकि वहां स्कूल में कुक मौजूद रहते हैं। ऐसे में समस्या नही होनी चाहिए। दूध की जांच के लिए लेक्टोमीटर खरीदने के निर्देश मिले हैं, लेकिन अभी तक बजट आवंटित नहीं हुआ है। शहर वाली स्कूलों में तो सरस बूथ से दूध लेने के आदेश आ गए है। अभी तक दूध बच्चों को फीका ही दिया जाएगा, ऐसे ही आदेश है। इस संबंध में ब्लाॅक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी देवकीनंदन गौड़ से मोबाईल पर वार्ता करने की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं हो पाई।